श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.176.6 
न वै चरसि यच्छ्रेय आत्मनो वा यदीशिषे।
अकामात्मापि हि सदा धुरमुद्यम्य चैव ह॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तू जो कामनाओं से रहित होकर भी अपने कल्याण के लिए प्रयत्न नहीं कर रहा है और मन को वश में नहीं कर रहा है, उसका कारण यही है कि तूने राज्य का भार अपने ऊपर ले लिया है॥6॥
 
'The reason why you are not striving for your own welfare and are not controlling your mind, despite being free from desires, is that you have taken the burden of the kingdom upon yourself.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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