श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.176.5 
तयोरेकतरे मार्गे यदेनमभिसन्नयेत्।
न सुखं प्राप्य संहृष्येन्नासुखं प्राप्य संज्वरेत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यदि विधाता उसे सुख या दुःख के मार्ग पर ले जाए, तो उसे न तो सुख पाकर प्रसन्न होना चाहिए और न दुःख पाकर व्यथित होना चाहिए ॥5॥
 
If the Creator takes him on the path of either happiness or sorrow, he should neither be happy on getting the happiness nor be distressed on getting the sorrow. ॥ 5॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas