| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश » श्लोक 21 |
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| | | | श्लोक 12.176.21  | तेषां परमदु:खानां बुद्धॺा भैषज्यमाचरेत्।
लोकधर्ममवज्ञाय ध्रुवाणामध्रुवै: सह॥ २१॥ | | | | | | अनुवाद | | अतः पुत्र-इच्छा आदि लोकधर्मों को, जो अनित्य शरीरों से जुड़े हुए हैं, त्यागकर, मनुष्य को विचारपूर्वक पूर्वोक्त महान् दुःखों का, जो अवश्यंभावी हैं, चिंतन करना चाहिए ॥21॥ | | | | ‘Therefore, by disregarding the folk religions like desire for a son etc. which are always associated with the impermanent bodies, one should thoughtfully treat the above mentioned great sorrows which are inevitable. 21॥ | | ✨ ai-generated | | |
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