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श्लोक 12.176.20  |
एवमेतानि दु:खानि तानि तानीह मानवम्।
विविधान्युपपद्यन्ते गात्रसंस्पर्शजान्यपि॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार मनुष्य मन को गर्म करने वाले और शरीर के स्पर्श से उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के दुःखों का अनुभव करता है॥ 20॥ |
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| ‘In this way, man experiences various kinds of sufferings which heat up the mind and are caused by the touch of the body.॥ 20॥ |
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