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श्लोक 12.176.16  |
श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो मोहयत्यविचक्षणम्।
सा तस्य चित्तं हरति शारदाभ्रमिवानिल:॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| धन-सम्पत्ति का निरन्तर संग मूर्ख के मन को मोह लेता है और उसे मोहग्रस्त कर देता है। जैसे वायु शरद ऋतु के बादलों को उड़ा ले जाती है, वैसे ही धन मनुष्य के मन को हर लेता है॥16॥ |
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| ‘The constant company of wealth and riches tempts the mind of a fool and keeps him bewildered. Just as the wind blows away the clouds of autumn, in the same way wealth takes away the mind of a man.॥ 16॥ |
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