श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.176.15 
निर्दशन्नधरोष्ठं च क्रुद्धो दारुणभाषिता।
कस्तमिच्छेत् परिद्रष्टुं दातुमिच्छति चेन्महीम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
क्रोध के कारण वह अपने होंठ काटता रहता है और अत्यन्त कठोर वचन बोलता है। यदि ऐसा मनुष्य संसार का सम्पूर्ण राज्य भी दान कर देना चाहे, तो भी उसकी ओर कौन देखना चाहेगा?॥15॥
 
‘Due to anger he keeps biting his lips and speaks very harsh words. Even if such a man wants to give away the entire kingdom of the world, who would want to look at him?॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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