श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.176.14 
धनवान् क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतन:।
तिर्यगीक्ष: शुष्कमुख: पापको भ्रुकुटीमुख:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
धनवान मनुष्य क्रोध और लोभ के आवेश में आकर अपनी तर्क शक्ति खो देता है, टेढ़ी आँखों से देखता है, उसका मुख सूखा रहता है, उसकी भौहें चढ़ी रहती हैं और वह पाप में लिप्त रहता है॥14॥
 
'A rich man, in the heat of anger and greed, loses his reasoning power, looks with crooked eyes, his face remains dry, his eyebrows are raised and he remains engrossed in sin.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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