श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.176.1 
युधिष्ठिर उवाच
धनिनश्चाधना ये च वर्तयन्ते स्वतन्त्रिण:।
सुखदु:खागमस्तेषां क: कथं वा पितामह॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! धनी और निर्धन दोनों ही स्वतन्त्रतापूर्वक आचरण करते हैं; फिर उन्हें सुख-दुःख किस रूप में और कैसे प्राप्त होते हैं?
 
Yudhishthira asked - Grandfather! Both the rich and the poor behave freely; then in what form and how do they get happiness and sorrow?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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