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mahabharat 12.174.48: इस प्रकार जीव बार-बार सुखद और अप्रिय पदार्थों का, सुख और दुःख का अनुभव करते रहते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.174.48 
एवमेव किलैतानि प्रियाण्येवाप्रियाणि च।
जीवेषु परिवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जीव बार-बार सुखद और अप्रिय पदार्थों का, सुख और दुःख का अनुभव करते रहते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥48॥
 
In this manner the living beings keep on experiencing pleasant and unpleasant things, pleasure and pain, again and again; there is no doubt about it. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)