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mahabharat 12.174.46: इस लोक के सुख और स्वर्ग के महान सुख मिलकर भी उस सुख के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हैं जो कामनाओं के निरोध से प्राप्त होता है ॥ 46॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.174.46 
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हत: षोडशीं कलाम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
इस लोक के सुख और स्वर्ग के महान सुख मिलकर भी उस सुख के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हैं जो कामनाओं के निरोध से प्राप्त होता है ॥ 46॥
 
The pleasures of this world and the great bliss of heaven are not even equal to one sixteenth of the pleasure that results from the cessation of desires. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)