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mahabharat 12.174.21: यह शरीर सुख का आधार है और दुःख का भी आधार है। जो मनुष्य अपने शरीर पर अभिमान करता है, वह अपने शरीर से जो भी कर्म करता है, उसके अनुसार सुख-दुःख का फल भोगता है ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 12.174: शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.174.21 
शरीरमेवायतनं सुखस्य
दु:खस्य चाप्यायतनं शरीरम्।
यद्यच्छरीरेण करोति कर्म
तेनैव देही समुपाश्नुते तत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
यह शरीर सुख का आधार है और दुःख का भी आधार है। जो मनुष्य अपने शरीर पर अभिमान करता है, वह अपने शरीर से जो भी कर्म करता है, उसके अनुसार सुख-दुःख का फल भोगता है ॥21॥
 
This body is the basis of happiness and it is also the basis of sorrow. A person who is proud of his body experiences the fruits of happiness and sorrow according to whatever deeds he does with his body. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)