श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 171: गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  12.171.7-8 
अयं वै जन्मना विप्र: सुहृत् तस्य महात्मन:।
सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम्॥ ७॥
तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रित: सदा।
भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गम:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वह मन ही मन कहने लगा, 'यह जन्म से तो ब्राह्मण है; परन्तु यह महान राजा का मित्र है। उस कश्यपपुत्र ने इसे मेरे पास भेजा है; अतः मैं इसका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। यह मुझ पर सदैव विश्वास करता है और मेरा भाई, सम्बन्धी और हार्दिक मित्र भी है।'
 
He started saying to himself, 'He is a Brahmin by birth only; but he is a friend of the great king. That son of Kashyap has sent him here to me; hence I will definitely do his favourite work. He always trusts me and is also my brother, relative and hearty friend. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)