श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 171: गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  12.171.25-26 
ततस्तान् राक्षसेन्द्रश्च द्विजानाह पुनर्वच:।
नानादेशगतान् राजन् राक्षसान् प्रतिषिध्य वै॥ २५॥
अद्यैकं दिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित्।
राक्षसेभ्य: प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
राजन! इसके बाद दैत्यराज विरुपाक्ष ने भिन्न-भिन्न देशों से आये हुए राक्षसों को उत्पात मचाने से रोककर उन ब्राह्मणों से कहा - 'विप्रगण! आज एक दिन तक तुम्हें राक्षसों से कोई भय नहीं है; अतः तुम भोग करो और शीघ्र ही अपने अभीष्ट स्थान पर जाओ। विलम्ब मत करो।' ॥25-26॥
 
Rajan! After this, the demon king Virupaksha stopped the demons who had come from different countries from doing violence and said to those Brahmins - 'Vipragan! Today for one day you have no fear from the demons; So enjoy and go to your desired destination soon. Don't delay'. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)