सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकान्॥ १९॥
वज्रान् महाधनांश्चैव वैदूर्याजिनराङ्कवान्।
रत्नराशीन् विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत ॥ २०॥
तत: प्राह द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो महाबल:।
गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टत:॥ २१॥
येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमा:।
तान्येवादाय गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत॥ २२॥
अनुवाद
भोजन के पश्चात् महाबली विरुपाक्ष ने ब्राह्मणों के सामने बहुत सारा सोना, चाँदी, मणि, मोती, हीरे, लाजवन्त, मृगचर्म और रत्न रख दिए और उनसे कहा, "हे ब्राह्मणो! तुम अपनी इच्छा और उत्साह के अनुसार इन रत्नों को ले जाओ और जिन पात्रों में तुमने भोजन किया है, उन्हें भी अपने घर ले जाओ।" ॥19-22॥
After the meal, the mighty Virupaksha placed a lot of gold, silver, precious stones, pearls, precious diamonds, lapis lazuli, deer skins and precious stones in front of the Brahmins and said to them, "O Brahmins! You may take these gems according to your desire and enthusiasm and also take the utensils in which you have eaten to your homes." ॥19-22॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥