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mahabharat 12.170.13: मैं तुम्हारा मित्र हो गया हूँ, तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह बढ़ गया है; इसलिए मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि तुम्हें धन प्राप्त हो ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.170: गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.170.13 
प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च मम त्वयि।
सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हारा मित्र हो गया हूँ, तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह बढ़ गया है; इसलिए मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि तुम्हें धन प्राप्त हो ॥13॥
 
'I have become your friend, my affection towards you has increased; therefore I will make such efforts that you may get money.'॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)