श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 170: गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.170.10 
ततोऽब्रवीद् गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते।
समुद्रगमनाकांक्षी द्रव्यार्थमिति भारत॥ १०॥
 
 
अनुवाद
तब गौतम ने उनसे कहा, 'महामते! मैं दरिद्र हूँ और धन की खोज में समुद्रतट पर जाने की इच्छा से घर से निकला हूँ।'॥10॥
 
Then Gautama said to him, 'Mahamate, I am poor and have left home with the desire to go to the seashore in search of wealth.'॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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