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mahabharat 12.168.52: वह ब्राह्मण दयालु था। गौतम के अनुरोध पर वह उसके घर रुका, किन्तु वहाँ की किसी वस्तु को छुआ तक नहीं। यद्यपि वह भूखा था और गौतम ने उससे भोजन के लिए बहुत आग्रह किया, फिर भी उसने वहाँ का भोजन करना स्वीकार नहीं किया। 52.   |   mahabharat अध्याय 12.168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  12.168.52 
स तत्र न्यवसद् विप्रो घृणी किञ्चिदसंस्पृशन्।
क्षुधितश्छन्द्यमानोऽपि भोजनं नाभ्यनन्दत॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
वह ब्राह्मण दयालु था। गौतम के अनुरोध पर वह उसके घर रुका, किन्तु वहाँ की किसी वस्तु को छुआ तक नहीं। यद्यपि वह भूखा था और गौतम ने उससे भोजन के लिए बहुत आग्रह किया, फिर भी उसने वहाँ का भोजन करना स्वीकार नहीं किया। 52.
 
That Brahmin was kind. At Gautam's request, he stayed at his place, but did not even touch anything there. Although he was hungry and Gautam made great requests to him to eat, even then he did not accept to eat the food there. 52.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)