श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.168.48 
अवबुुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम्।
अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
अब भी अपने को पहचानो! तुम द्विज हो; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दया का स्मरण करो और इस निवासस्थान को त्याग दो॥48॥
 
'Even now, recognize yourself! You are Dwija; Therefore, remember the Dvijochit Sattva, modesty, knowledge of scriptures, restraint and kindness and leave this place of your residence. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)