श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.168.41 
स ब्रह्मचारी तद्देश्य: सखा तस्यैव सुप्रिय:।
तं दस्युग्राममगमद् यत्रासौ गौतमोऽवसत्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण गौतम के ही गाँव का निवासी था और गौतम का परम प्रिय मित्र था। घूमते-घूमते वह डाकुओं के उसी गाँव में पहुँचा जहाँ गौतम रहते थे ॥ 41॥
 
That celibate Brahmin was a resident of the same village as Gautama and was his dearest friend. While wandering around he reached the same village of robbers where Gautama lived. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)