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mahabharat 12.168.38-39h: गौतम भी डाकुओं के साथ रहने के कारण उनकी तरह पूर्ण डाकू बन गया। उसने कई महीने डाकुओं के गाँव में सुखपूर्वक रहकर प्रतिदिन अनेक पक्षियों का शिकार किया।   |   mahabharat अध्याय 12.168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  12.168.38-39h 
गौतम: संनिकर्षेण दस्युभि: समतामियात्।
तथा तु वसतस्तस्य दस्युग्रामे सुखं तदा॥ ३८॥
अगमन् बहवो मासा निघ्नत: पक्षिणो बहून्।
 
 
अनुवाद
गौतम भी डाकुओं के साथ रहने के कारण उनकी तरह पूर्ण डाकू बन गया। उसने कई महीने डाकुओं के गाँव में सुखपूर्वक रहकर प्रतिदिन अनेक पक्षियों का शिकार किया।
 
Gautama too became a complete robber like them due to his association with the robbers. He spent many months happily living in the village of the robbers and hunting many birds every day. 38 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)