श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.168.35 
कुटुम्बार्थं च दास्याश्च साहाय्यं चाप्यथाकरोत्।
तत्रावसत् स वर्षांश्च समृद्धे शबरालये॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वह दासी के परिवार की भी मदद करने लगा। ब्राह्मण कई वर्षों तक भील के समृद्ध घर में रहा।
 
He also started helping the maid's family. The Brahmin lived in the prosperous house of the Bhil for many years.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)