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mahabharat 12.168.32-33: ब्राह्मण उसके घर गया और भिक्षा माँगी। दस्यु ने ब्राह्मण को रहने के लिए एक घर दिया और उसके लिए एक वर्ष तक पर्याप्त भोजन की व्यवस्था की, उसे उपयुक्त नए वस्त्र दिए और उसकी सेवा के लिए एक युवा दासी भी दी, जो उस समय पतिविहीन थी।   |   mahabharat अध्याय 12.168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  12.168.32-33 
तस्य क्षयमुपागम्य ततो भिक्षामयाचत।
प्रतिश्रयं च वासार्थं भिक्षां चैवाथ वार्षिकीम्॥ ३२॥
प्रादात् तस्मै स विप्राय वस्त्रं च सदृशं नवम्।
नारीं चापि वयोपेतां भर्त्रा विरहितां तथा॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण उसके घर गया और भिक्षा माँगी। दस्यु ने ब्राह्मण को रहने के लिए एक घर दिया और उसके लिए एक वर्ष तक पर्याप्त भोजन की व्यवस्था की, उसे उपयुक्त नए वस्त्र दिए और उसकी सेवा के लिए एक युवा दासी भी दी, जो उस समय पतिविहीन थी।
 
The Brahmin went to his house and begged for alms. The Dasyu gave the Brahmin a house to live in and arranged alms of food sufficient to sustain him for a year, gave him suitable new clothes and also gave him a young maidservant to serve him, who was without a husband at that time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)