श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 168: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.168.1 
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ कुरूणां प्रीतिवर्धन।
प्रश्नं कञ्चित् प्रवक्ष्यामि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले- हे कौरव कुल का प्रेम बढ़ाने वाले महाज्ञानी पितामह! मैं आपके समक्ष कुछ और प्रश्न उपस्थित कर रहा हूँ। कृपया मेरे उन प्रश्नों पर विचार करें॥1॥
 
Yudhishthira said- O great knowledgeable grandfather who increases the love of the Kaurava clan! I am presenting some more questions before you. Please discuss those questions of mine.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)