श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.167.7 
धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोका: प्रतिष्ठिता:।
धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थ: समाहित:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
धर्म के बल पर ही ऋषियों ने संसार सागर को पार किया है। धर्म से ही समस्त जगत का पालन-पोषण होता है। धर्म के बल पर ही देवताओं ने उन्नति की है और धर्म में ही धन का वास है ॥7॥
 
It is by virtue of Dharma that the sages have crossed the ocean of the world. The whole world is sustained by Dharma. It is by virtue of Dharma that the gods have progressed and it is in Dharma that wealth also exists. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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