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mahabharat 12.167.35: जैसे दही का सार मक्खन है, वैसे ही धर्म और अर्थ का सार काम है। जैसे चोकर से तेल श्रेष्ठ है, छाछ से घी श्रेष्ठ है और वृक्ष के फूल और फल उसकी लकड़ी से श्रेष्ठ हैं, वैसे ही धर्म और अर्थ से काम श्रेष्ठ है ॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.167.35 
नवनीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मत:।
श्रेयस्तैलं हि पिण्याकाद् घृतं श्रेय उदश्वित:।
श्रेय: पुष्पफलं काष्ठात् कामो धर्मार्थयोर्वर:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जैसे दही का सार मक्खन है, वैसे ही धर्म और अर्थ का सार काम है। जैसे चोकर से तेल श्रेष्ठ है, छाछ से घी श्रेष्ठ है और वृक्ष के फूल और फल उसकी लकड़ी से श्रेष्ठ हैं, वैसे ही धर्म और अर्थ से काम श्रेष्ठ है ॥ 35॥
 
Just as the essence of curd is butter, similarly the essence of Dharma and Artha is Kaam. Just as oil is better than bran, ghee is better than buttermilk and the flowers and fruits of a tree are better than its wood, similarly Kaam is better than Dharma and Artha. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)