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mahabharat 12.167.20: वही धनवान है जो अपने सेवकों को उत्तम भोजन देकर और शत्रुओं को दण्ड देकर वश में रखता है। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज! यह मत मुझे सर्वाधिक उपयुक्त लगता है। अब उन दोनों की बात सुनो। उनकी वाणी उनके कण्ठ तक पहुँच गई है, अर्थात् ये दोनों भाई बोलने में शीघ्रता कर रहे हैं। 20॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.167.20 
भृत्यान् भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान्।
एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम्।
अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयो:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वही धनवान है जो अपने सेवकों को उत्तम भोजन देकर और शत्रुओं को दण्ड देकर वश में रखता है। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज! यह मत मुझे सर्वाधिक उपयुक्त लगता है। अब उन दोनों की बात सुनो। उनकी वाणी उनके कण्ठ तक पहुँच गई है, अर्थात् ये दोनों भाई बोलने में शीघ्रता कर रहे हैं। 20॥
 
Only he is rich who keeps his servants under control by giving them good food and by punishing his enemies. Maharaja, the best among the wise! This opinion suits me best. Now listen to both of them. Their speech has reached their throats, that is, these two brothers are in a hurry to speak. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)