| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय » श्लोक 17-18 |
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| | | | श्लोक 12.167.17-18  | काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला ह्रीनिषेविण:।
विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ता: सर्वपरिग्रहै:॥ १७॥
अर्थार्थिन: सन्ति केचिदपरे स्वर्गकांक्षिण:।
कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वं स्वं धर्ममनुष्ठिता:॥ १८॥ | | | | | | अनुवाद | | जो विद्वान पुरुष सब प्रकार की सम्पत्ति से रहित, विनयशील, शान्त, गेरुए रंग के और दाढ़ी वाले होते हैं, वे भी धन की इच्छा करते देखे गए हैं। कुछ अन्य प्रकार के लोग भी हैं जो स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं; तथा अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्मों का पालन करते हुए, कुल-परम्परा के नियमों का पालन करते हुए, धन की इच्छा करते हैं।॥17-18॥ | | | | Learned men who are devoid of all kinds of possessions, modest, calm, saffron-coloured, and bearded have also been seen to desire wealth. There are some other types of people who desire to attain heaven; and are performing the duties of their respective castes and ashrams, following the family-traditional rules; but they too desire wealth.॥17-18॥ | | ✨ ai-generated | | |
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