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mahabharat 12.167.16: मुंडा सिर वाला, केश और मृगचर्म धारण करने वाला, संयमित मन और शरीर वाला, सदाचारी ब्रह्मचारी भी धन की इच्छा से पृथक् निवास करता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 167: धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.167.16 
जटाजिनधरा दान्ता: पङ्कदिग्धा जितेन्द्रिया:।
मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिन: पृथक्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मुंडा सिर वाला, केश और मृगचर्म धारण करने वाला, संयमित मन और शरीर वाला, सदाचारी ब्रह्मचारी भी धन की इच्छा से पृथक् निवास करता है ॥16॥
 
The shaven headed, ethical celibate wearing hair and deer skin, having a balanced mind with a balanced mind and body, also resides separately with the desire of wealth. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)