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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 166: खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 49-50h
 
 
श्लोक  12.166.49-50h 
बिभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम्।
नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं वहन्॥ ४९॥
शुशुभातेऽतिविमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले।
 
 
अनुवाद
उन्होंने काले मृगचर्म का वस्त्र धारण किया था, जिसमें सुनहरे तारे जड़े हुए थे। उनके माथे पर सूर्य के समान एक चमकीली आँख थी। इसके अलावा, काले और लाल रंग की दो और अत्यंत पवित्र आँखें भी उनके शरीर की शोभा बढ़ा रही थीं। 49 1/2
 
He wore black deerskin as his clothes, in which golden stars were embedded. He wore a bright eye like the Sun on his forehead. Apart from that, two more very pure eyes of black and red colour were also adding beauty to his body. 49 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)