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mahabharat 12.166.44-45h: तत्पश्चात् वह प्रेतात्मा उस रूप को छोड़कर तीस अंगुल से कुछ बड़ी तलवार के रूप में प्रकट हुई। उसकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण थी। वह चमकती हुई तलवार काल और अंतक के समान तत्पर दिखाई दे रही थी।   |   mahabharat अध्याय 12.166: खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 166: खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  12.166.44-45h 
ततस्तद्‍रूपमुत्सृज्य बभौ निस्त्रिंश एव स:॥ ४४॥
विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यत:।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वह प्रेतात्मा उस रूप को छोड़कर तीस अंगुल से कुछ बड़ी तलवार के रूप में प्रकट हुई। उसकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण थी। वह चमकती हुई तलवार काल और अंतक के समान तत्पर दिखाई दे रही थी।
 
Thereafter, the ghost left that form and started appearing in the form of a sword a little bigger than thirty fingers. Its edge was very sharp. That shining sword appeared ready like Kaal and Antaka. 44 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)