श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 165: नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.165.25 
प्रजा: पशूंश्च स्वर्गं च हन्ति यज्ञो ह्यदक्षिण:।
इन्द्रियाणि यश: कीर्तिमायुश्चाप्यवकृन्तति॥ २५॥
 
 
अनुवाद
दक्षिणा रहित यज्ञ मनुष्य और पशुओं का नाश करता है, स्वर्ग प्राप्ति में बाधा डालता है, इतना ही नहीं, इन्द्रियाँ, यश, कीर्ति और आयु को भी क्षीण करता है ॥25॥
 
A sacrifice without dakshina destroys the people and animals; and also creates obstacles in attaining heaven. Not only this, it also weakens the senses, fame, reputation and age. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)