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mahabharat 12.163.15: सत्य का त्याग करने और दुष्टों की संगति करने से मत्स्य दोष उत्पन्न होता है। तत्! महापुरुषों की सेवा और संगति करने से यह दोष नष्ट हो जाता है। 15॥   |   mahabharat अध्याय 12.163: काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 163: काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.163.15 
सत्यत्यागात् तु मात्सर्यमहितानां च सेवया।
एतत् तु क्षीयते तात साधूनामुपसेवनात्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
सत्य का त्याग करने और दुष्टों की संगति करने से मत्स्य दोष उत्पन्न होता है। तत्! महापुरुषों की सेवा और संगति करने से यह दोष नष्ट हो जाता है। 15॥
 
Abandoning the truth and associating with the wicked gives rise to the defect of Matsarya. Tat! It is destroyed by serving and associating with great men. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)