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mahabharat 12.162.23: पृथ्वीनाथ! सत्य के गुणों की सीमा नहीं बताई जा सकती। इसीलिए पितर और देवताओं सहित ब्राह्मण भी सत्य की स्तुति करते हैं॥23॥   |   mahabharat अध्याय 12.162: सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 162: सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.162.23 
नान्त: शक्यो गुणानां च वक्तुं सत्यस्य पार्थिव।
अत: सत्यं प्रशंसन्ति विप्रा: सपितृदेवता:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! सत्य के गुणों की सीमा नहीं बताई जा सकती। इसीलिए पितर और देवताओं सहित ब्राह्मण भी सत्य की स्तुति करते हैं॥23॥
 
Prithvinath! The limits of the qualities of truth cannot be told. That is why Brahmins along with ancestors and gods praise the truth. 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)