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श्लोक 12.16.3  |
न वक्ष्यामि न वक्ष्यामीत्येवं मे मनसि स्थितम्।
अतिदु:खात्तु वक्ष्यामि तन्निबोध जनाधिप॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| जनेश्वर! मैंने मन में कई बार निश्चय किया है कि 'मैं अब नहीं बोलूँगा, मैं नहीं बोलूँगा;' परन्तु महान दुःख के कारण मुझे बोलना पड़ रहा है। कृपया मेरी बात सुनिए। |
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| 'Janeshwar! I have decided many times in my mind that 'I will not speak now, I will not speak;' but due to the great sorrow I have to speak. Please listen to me. |
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