श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 16: भीमसेनका राजाको भुक्त दु:खोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.16.25 
तस्मादद्यैव गन्तव्यं युद्धॺस्व भरतर्षभ।
परमव्यक्तरूपस्य व्यक्तं त्यक्त्वा स्वकर्मभि:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे भारतश्रेष्ठ! अतः अब तुम्हें इस प्रत्यक्ष स्थूल शत्रु को छोड़कर अदृश्य (सूक्ष्म) शत्रु मन से युद्ध करना चाहिए। तुम्हें अपने विचार आदि बौद्धिक कार्यों द्वारा उससे युद्ध करना चाहिए॥ 25॥
 
‘Bhaarat Shrestha! Therefore, leaving aside the visible physical enemy, you should now go to fight with the invisible (subtle) enemy mind. You must fight with it through your intellectual activities like thoughts etc.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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