श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 16: भीमसेनका राजाको भुक्त दु:खोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.16.23 
यत्र नास्ति शरै: कार्यं न मित्रैर्न च बन्धुभि:।
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
इस युद्ध में न तो बाण काम आते हैं, न मित्र-सम्बन्धियों की सहायता। तुम्हें ही युद्ध करना है। वह युद्ध तुम्हारे सामने उपस्थित है॥ 23॥
 
'In this war neither arrows nor the help of friends and relatives are of any use. You alone have to fight. That war is present in front of you.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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