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श्लोक 12.16.2  |
राजन् विदितधर्मोऽसि न तेऽस्त्यविदितं क्वचित्।
उपशिक्षाम ते वृत्तं सदैव न च शक्नुम:॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| राजन्! आप सभी धर्मों के ज्ञाता हैं। आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। हम आपसे सदैव नीति की शिक्षा प्राप्त करते हैं। हम आपको शिक्षा नहीं दे सकते। ॥2॥ |
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| ‘King! You are the knower of all religions. Nothing is unknown to you. We always receive teachings of moral conduct from you. We cannot teach you. ॥ 2॥ |
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