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mahabharat 12.155.18: तुम मोहवश वायु की अनंत शक्ति को नहीं जानते; इसलिए मैं यहीं से सीधा वायुदेव के पास जाऊँगा॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.155: नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 155: नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.155.18 
त्वं तु मोहान्न जानीषे वायोर्बलमनन्तकम्।
एवं तस्माद् गमिष्यामि सकाशं मातरिश्वन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तुम मोहवश वायु की अनंत शक्ति को नहीं जानते; इसलिए मैं यहीं से सीधा वायुदेव के पास जाऊँगा॥18॥
 
Due to your infatuation you do not understand the infinite power of the wind; therefore from here I shall go straight to the wind-god.॥ 18॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)