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श्लोक 12.154.8  |
सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकस:।
वसन्ति तत्र मार्गस्था: सुरम्ये नगसत्तमे॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| समूह में यात्रा करने वाले व्यापारी, वन में रहने वाले तपस्वी तथा अन्य यात्री भी इस सुन्दर एवं उत्तम वृक्ष के नीचे निवास करते थे ॥8॥ |
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| Merchants traveling in groups, ascetics in the forest and other wayfarers also used to reside under this beautiful and excellent tree. ॥ 8॥ |
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