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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 154: नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.154.21 
ब्राह्मणैश्च तप:सिद्धैस्तापसै: श्रमणैस्तथा।
त्रिविष्टपसमं मन्ये तवायतनमेव हि॥ २१॥
 
 
अनुवाद
तपस्वी, ब्राह्मण और तपस्या से शुद्ध हुए श्रमणों से परिपूर्ण आपका यह स्थान मुझे स्वर्ग के समान प्रतीत होता है।'
 
'Your place, filled with ascetics, Brahmins and Shramanas purified by austerity, appears to me like heaven.'
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें वायु और शाल्मलिसंवादके प्रसंगमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)