श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 154: नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.154.13 
किं नु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत्।
त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! क्या पवनदेव किसी कारणवश आप पर विशेष प्रसन्न हैं अथवा वे आपके मित्र हैं, जिसके कारण वे इस वन में सदैव आपकी रक्षा करते हैं।
 
'Father! Is the Wind-God especially pleased with you for some reason or is he your friend, due to which he always protects you in this forest.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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