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श्लोक 12.154.13  |
किं नु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत्।
त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम्॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| पिताजी! क्या पवनदेव किसी कारणवश आप पर विशेष प्रसन्न हैं अथवा वे आपके मित्र हैं, जिसके कारण वे इस वन में सदैव आपकी रक्षा करते हैं। |
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| 'Father! Is the Wind-God especially pleased with you for some reason or is he your friend, due to which he always protects you in this forest. |
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