श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 153: मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  12.153.93-94 
भीष्म उवाच
तथा धर्मविरोधेन प्रियमिथ्याभिधायिना।
श्मशानवासिना नित्यं रात्रिं मृगयता नृप॥ ९३॥
ततो मध्यस्थतां नीता वचनैरमृतोपमै:।
जम्बुकेन स्वकार्यार्थं बान्धवास्तस्य धिष्ठिता:॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, "हे राजन! वह सियार सदैव श्मशान में रहता था और अपना कार्य सिद्ध करने के लिए रात्रि की प्रतीक्षा कर रहा था; अतः उसने झूठे और अमृत वचन बोलकर बालक के मित्रों और सम्बन्धियों को बीच में फँसा दिया। वे न तो जा सकते थे और न ही रुक सकते थे, अतः अन्त में उन्हें वहीं रुकना पड़ा।"
 
Bhishma said, "O King! That jackal always resided in the cremation ground and was waiting for the night to accomplish his task; therefore, by uttering false and ambrosial words, he trapped the boy's friends and relatives in the middle. They were neither able to go nor could stay, so at last they had to stay back.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)