श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 153: मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता  »  श्लोक 87-88h
 
 
श्लोक  12.153.87-88h 
प्रदीप्ता: पुत्रशोकेन संनिवर्तत मानुषा:॥ ८७॥
श्रुत्वा गृध्रस्य वचनं पापस्येहाकृतात्मन:।
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों! यह गिद्ध महापापी और मलिन हृदय वाला है। अपने पुत्र के शोक से जलते हुए भी तुम इसकी बातें सुनकर क्यों लौट रहे हो?॥87 1/2॥
 
Human beings! This vulture is a great sinner and has an impure heart. Why are you returning after listening to his words despite burning with grief for your son?॥ 87 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)