श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 153: मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता  »  श्लोक 86-87h
 
 
श्लोक  12.153.86-87h 
अहो धिग् गृध्रवाक्येन यथैवाबुद्धयस्तथा॥ ८६॥
कथं गच्छत नि:स्नेहा: सुतस्नेहं विसृज्य च।
 
 
अनुवाद
अरे! तुम्हें शर्म आनी चाहिए! तुम लोग कैसे मूर्खों की तरह पुत्र-प्रेम से रहित होकर गिद्धों के वशीभूत होकर घर लौट रहे हो? ॥86 1/2॥
 
Oh! Shame on you. How are you people returning home like fools, devoid of the love for your son, after being influenced by the vultures? ॥ 86 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)