श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 153: मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक  12.153.59-60 
त्यज्यतामेष निस्तेजा: शून्य: काष्ठत्वमागत:।
अन्यदेहविषक्तं हि शावं काष्ठत्वमागतम्॥ ५९॥
त्यक्तजीवस्य चैवास्य कस्माद्धित्वा न गच्छत।
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निष्फलश्च परिश्रम:॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
यह मृत बालक अपनी कान्ति खोकर लकड़ी के एक बेकार टुकड़े के समान हो गया है। इसे छोड़ दो। इसकी आत्मा दूसरे शरीर में आसक्त हो गई है। इस निर्जीव बालक का शरीर लकड़ी के एक टुकड़े के समान हो गया है। तुम इसे छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? तुम्हारा प्रेम व्यर्थ है और तुम्हारे प्रयास भी निष्फल हैं ॥59-60॥
 
This dead child has lost his radiance and has become like a useless piece of wood. Leave him. His soul is attached to another body. The body of this lifeless child has become like a piece of wood. Why don't you leave him and go away? Your love is useless and your efforts are also fruitless. ॥ 59-60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)