श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 153: मृतककी पुनर्जीवनप्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.153.25 
अपश्यतां प्रियान् पुत्रांस्तेषां शोको न तिष्ठति।
न च पुष्णन्ति संवृद्धास्ते मातापितरौ क्वचित्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि उनके बच्चे बड़े होने पर अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते, फिर भी अपने प्यारे बच्चों को न देख पाने का उनका दुःख असहनीय होता है।
 
'Although their children do not take care of their parents when they grow up, yet their grief at not seeing their beloved children is uncontrollable.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)