ते पश्यत सुतस्नेहो यादृश: पशुपक्षिणाम्।
न तेषां धारयित्वा तान् कश्चिदस्ति फलागम:॥ २२॥
चतुष्पात्पक्षिकीटानां प्राणिनां स्नेहसङ्गिनाम्।
परलोकगतिस्थानां मुनियज्ञक्रिया इव॥ २३॥
अनुवाद
‘देखो, पशु-पक्षी अपने बच्चों के प्रति कितना स्नेह रखते हैं। यद्यपि वे पशु, पक्षी, कीट आदि प्रेम में आसक्त होकर अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं, परन्तु परलोक में उनसे उन्हें वैसा कोई फल नहीं मिलता जैसा परलोक में रहने वाले ऋषियों को यज्ञ आदि करने से मिलता है।॥ 22-23॥
‘See the affection that animals and birds have for their children. Although those animals, birds, insects etc., who are attached to love, nurture their children, they do not get any reward from them in the next world like the sages who are in the next world get from performing yajnas etc.॥ 22-23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥