श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.152.34 
बृहस्पतिरुवाच
कृत्वा पापं पूर्वमबुद्धिपूर्वं
पुण्यानि चेत्कुरुते बुद्धिपूर्वम्।
स तत् पापं नुदते कर्मशीलो
वासो यथा मलिनं क्षारयुक्तम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पति बोले - यदि कोई मनुष्य पहले अनजाने में पाप कर ले और फिर जानकर पुण्य कर्म करे, तो वह पुण्यकर्मों में तत्पर मनुष्य अपने पापों को उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे कपड़े पर लगा मैल क्षार (सोडा, साबुन आदि) लगाने से दूर हो जाता है।
 
Brihaspati said - If a man first commits a sin unknowingly and then knowingly performs pious deeds, then that man devoted to good deeds removes his sins in the same way as the dirt on a cloth is removed by applying alkali (soda, soap etc.).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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