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mahabharat 12.151.9: ‘ब्रह्मन्! शौनक! आप विद्वान् हैं और मैं मूर्ख हूँ। कृपया मेरे बालपन पर ध्यान न दें और मुझ पर उसी प्रकार प्रसन्न हों, जैसे पिता अपने पुत्र पर स्वाभाविक रूप से प्रसन्न होता है।’॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.151.9 
अविज्ञायैव मे प्रज्ञां बालस्येव स पण्डित:।
ब्रह्मन् पितेव पुत्रस्य प्रीतिमान् भव शौनक॥ ९॥
 
 
अनुवाद
‘ब्रह्मन्! शौनक! आप विद्वान् हैं और मैं मूर्ख हूँ। कृपया मेरे बालपन पर ध्यान न दें और मुझ पर उसी प्रकार प्रसन्न हों, जैसे पिता अपने पुत्र पर स्वाभाविक रूप से प्रसन्न होता है।’॥9॥
 
‘Brahman! Shaunak! You are a learned man and I am a fool. Please do not pay attention to my childishness and be pleased with me in the same way as a father is naturally pleased with his son.'॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)