श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.151.20 
केचिदेव महाप्राज्ञा: प्रतिज्ञास्यन्ति तत्त्वत:।
जानीहि मत्कृतं तात ब्राह्मणान् प्रति भारत॥ २०॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! भारत! मेरे मन्तव्य को केवल कुछ ही ज्ञानी पुरुष ही समझ पाएँगे। मेरे सभी प्रयास ब्राह्मणों के हित के लिए हैं। यह बात तुम्हें भली-भाँति जान लेनी चाहिए।
 
Father! Bharat! Only a few highly knowledgeable people will be able to understand my intentions in their true form. All my efforts are for the good of the Brahmins. You should know this well.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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